कबीर के दोहे (पद्य) — Key Points
कबीरदास के दोहे जीवन की सच्चाइयों को समझने और अच्छा मनुष्य बनने की प्रेरणा देते हैं।
गुरु गोविंद से भी श्रेष्ठ हैं, क्योंकि गुरु ही शिष्य को गोविंद का ज्ञान कराते हैं।
कबीरदास ने सच्चे साधु के स्वभाव की तुलना अनाज फटकने वाले सूप से की है।
सच्चा साधु सार्थक बातों को ग्रहण करता है और सारहीन बातों को छोड़ देता है।
मनुष्य को अहंकार छोड़कर ऐसी मधुर वाणी बोलनी चाहिए, जिससे दूसरों को शांति मिले।
मधुर वाणी बोलने से दूसरों के साथ स्वयं को भी मानसिक शांति प्राप्त होती है।
कबीरदास ने दिखावे वाले बड़प्पन की तुलना ऊँचे खजूर के पेड़ से की है।
खजूर का पेड़ बहुत ऊँचा होने पर भी पथिक को छाया नहीं देता और उसका फल दूर होता है।
निंदक को अपने पास रखना चाहिए, क्योंकि वह हमारी कमियों को पहचानने में सहायता करता है।
निंदक बिना पानी और साबुन के हमारे स्वभाव को निर्मल करने में सहायक होता है।
कबीर के दोहों को साखी भी कहा जाता है, क्योंकि वे उनके ज्ञान और अनुभव के साक्षी हैं।
कबीरदास की रचनाएँ मुख्यतः कबीर ग्रंथावली में संगृहीत हैं और उनके दोहे बहुत प्रसिद्ध हैं।
कबीरदास का जन्म सन् 1398 ई. में हुआ था और वे संत परंपरा के प्रसिद्ध कवि थे।
कबीरदास के दोहों में गुरु, साधुता, मधुर वाणी, विनम्रता और आत्मशुद्धि का महत्व बताया गया है।
दोहा एक मात्रिक छंद है, जिसमें तेरह और ग्यारह मात्राएँ क्रमशः मिलाकर चौबीस मात्राएँ होती हैं।